बिहार का शोक कोशी अपने पहचान को चरितार्थ करते हुए १८ अगस्त को अपने पूर्वी बाँध को तोड़ कर जो स्थिति कायम की है वह स्वयं ही अपनी भयंकरता की कहानी ब्यान कर रही है। हालात ये है कि अनेक जगह अब भी १०-११ फीट पानी बह रहा है और वह भी अत्यधिक वेग के साथ, जिसे पार करना सेना की जवानों के लिए भी मुश्किल साबित हो रहा है।
अनेक जगह आज भी १२ दिनों के बीतने के बाद भी लोग भूखे-प्यासे बुरी तरह फँसे हुए हैं। वह जिस छत पर शरण लिए हैं वह भी अब हिलने लगा है। इस विपदा का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि र्राहत कार्य नगण्य साबित हो रहा है। सबसे अधिक प्रभावित वीरपुर, प्रतापगंज, बलुआ, छातापुर, जोरगामा, त्रिवेणीगंज इत्यादि हैं।
फँसे हुए लोगों का यह हाल है कि ललित्ग्राम के पास एक गाँव में एक छत पर १५० व्यक्ति जीवन व मौत के बीच जूझ रहे हैं। पत्रकार गौरी नाथ कई अफसरों के पास जाकर गुहार लगाया पर एक भी नाव अब तक नहीं आया, फँसे लोगों को निकालने के लिए। उस छत पर दो गर्भवती महिलाएँ भी हैं, एक वहीं अपने बच्चे को जन्म दी तथा दूसरी दर्द से छटपटाती जीवन-मौत से लड़ रही है।
दूसरी तरफ कई प्राइवेट नाव वाले इलाके में लुट-पाट कर रहे हैं। मनमानी रकम वसूल कर कुछ लोगों को निकालते हैं और मौका मिलने पर इज्जत से खेलने पर भी बाज नहीं आते।
प्रशासन सिर्फ बाँध को बचाने में ही नाकामयाब नहीं हुई, बल्कि वर्तमान स्थिति से निपटने में भी विफल साबित हो रही है। लोगों को पिने की साफ पानी कि सख्त आवश्यकता है, ताकि महामारी को कम किया जा सके।
भविष्य में राहत सामग्री के बन्दर बाँट के ख़बर हमें मिले तो इसमें हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार हमारी नियति बन चुकी है।
इस महाप्रलय की स्थिति में मानवता की रक्षा करते हुए हमें राजनीति से ऊपर उठकर पीड़ितों की तन-मन-धन से सहयोग करना चाहिए। आप अपना सहयोग मुख्यमंत्री रहत कोष, स्वयंसेवी संस्था या फिर हमें दे सकते हैं। हम संतमत सत्संग आश्रम, संतनगर (सहरसा) में बाढ़ राहत कोष का गठन किए हैं। आप सब निम्न पते पर अपना सहयोग भेज सकते हैं :
दिनेश कुमार वर्मा
संतमत सत्संग आश्रम
संतनगर, सहरसा - ८५२२०१ (बिहार)
Saturday, August 30, 2008
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